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Tuesday, November 5, 2013

आज थक गये है फिर से..



आज थक गये है फिर से,
बैठना चाहते है किसी पेड़ कि छाया तले,
लेकिन क्यूँ वो छाया भी अब मुझे अब मिल नहीं रही,
बस दौड़ ही क्यूँ बची है ज़िन्दगी में अब मेरी,,
कभी खुद से ही जंग है तो,
कभी औरो से है छिड़ी ,
कभी हम सोचते हुए युही घर से निकल पड़े,
कभी थक के यु गिरे वहाँ कोई था जो थम ले,
आज फिर से उन्ही काँटों से मेरे पैर छिल गए,
जिन्हे तोड़ कर राहों में मेरी फेंका था तुम्ही ने,
आज थक गये है फिर से,
बैठना चाहते है किसी पेड़ कि छाया तले….!!!!