There was an error in this gadget

Monday, July 7, 2014

ज़िंदगी



ज़िंदगी की राह मे आज  ठोकर है लगी,
लोगों ने माना सीख है मैने माना ज़िंदगी,
वो ज़िंदगी क्या ज़िंदगी जो अविरल पानी सी बही,
ज़िंदगी तो वो है जो कांटों के पथ से है सजी,
कांटों के चुभने से भी ये कभी भी ना रुकी,
कोई भी ग़म जो आये, पीछे खीच सकता नहीं
घड़ी के हाथों के तले वक़्त को बांधे चली,
साथी बने और वो छूटे फिर भी ये बढ़ती रही,
राह का पथिक मान कर सबको पीछे छोड़ा यूही,
आज इसने सिखला दिया क्या है रास्ता सही,
कौन तेरा साथी रहा था, और कौन वो जो था ही नहीं,
बढ़ते कदम ने ज़िंदगी के मुझको सिखलाया यही,
बढ़ती रहू इस ज़िंदगी के पथ पे बिना रुके हुए कहीं,
ज़िदगी की शान तो गतिरोधकों से ही है बनी…!!