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Wednesday, December 17, 2014

सुकून का मंजर

कबसे सुकून का मंजर मेरी आँखों मे नहीं है,
जबसे तू गया है मेरी नींद खो गयी है,
नैनों मे आँसुओं की लम्बी झड़ी लगी है,
कबसे सुकून का मंजर मेरी आँखों मे नहीं है,
इस दर्द से मेरी भी एक ज़ंग छिड़ गयी है,
दिल मे ना चैन कोई, मेरी नींद खो गयी है,
मेरी खुद की आत्मा अब मुझसे लड़ने लगी है,
कबसे सुकून का मंजर मेरी आँखों मे नहीं है,
कोई नहीं है अब ये अश्‍क़ पोंछने को,
तेरा पता पूछती ये आँखें ताक़ मे खड़ी है,
कैसे तुझे बुलायें, बेइंतेहाँ ये फासले है,
अभी हमें अपने सफ़र तय करने बचे है..!!

By: FIND ME

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